बलौदाबाजार,
फागूलाल रात्रे, लवन।
फागूलाल रात्रे, लवन।
पुराने समय के लोग बताते है, कि लवन समेत आसपास का इलाका घने पेड़-पौधों से घिरा हुआ था। आज पूरे क्षेत्र में पेड़ न होने की वजह से विरान सा प्रतीत हो रहा है। दरअसल, मकान बनाना हो या सडक़, अंधाधुंध रफ्तार से पेड़ काटे जा रहे है। रोड किनारे लगे पेड़ो की अंधाधुंध कटाई से विरान सा दिख रहा है। साथ ही खेतों के मेढ़ में पहले पेड़ ही पेड़ नजर आते थे, लेकिन वर्तमान समय में किसानों के द्वारा पूरी पेड़ को काटकर विरान बना दिया है। लोग सोचते है कि एक पेड़ कट जाने से भला पर्यावरण पर कौन सी आफत आ जायेगी। जबकि विभाग पुराने पेड़ बचाने की बजाय नये लगाने की योजनाओं पर ज्यादा जोर देता है। गलोबल-वार्मिग की समस्या से जूझ रही दुनिया के लिए पर्यावरण असंतुलन खतरा बन गया है। अंधाधुंध काटे जा रहे वृक्षों से सिमट रहे जंगल इसका प्रमुख कारण है। फिर भी लोग चेतने को तैयार नहीं है। लिहाजा बढ़ती आबादी के कारण न केवल हरियाली गुम हो रही है, बल्कि सांस लेने के अनुकूल वायु व पीने को शुद्व जल भी नसीब नहीं हो रहा है। ऐसा नहीं कि पर्यावरण संतुलन के लिए सरकारी योजनाएं नहीं है। इसको लेकर तमाम योजनाएं बनी है, बावजूद धरती सूनी ही है। बढ़ती आबादी व आर्थिक कारणों से पेड़ धड़ाधड़ काटे जा रहे है। जिसके स्थान पर कंक्रीट का जंगल फैलता जा रहा है। जिससे शहरों के साथ ही साथ ग्रामीण अंचल भी प्रभावित होने लगी है। पॉलीथीन इस्तेमाल की पाबंदी भी बेमतल साबित हो रही है। जिससे जल, जंगल व जमीन तीनों का चेहरा फीका हो गया है। एक तरफ लोगों के द्वारा पेड़ पौधे काटे जा रहे है, लेकिन पेड़ लगाये नहीं जा रहे है नतीजन पर्यावरण न होने की वजह से गर्मी तेज हो रही है। गांव व नगर में पंचायतों के द्वारा यदि खाली पड़ी भूमि पर पेड़-पौधे लगाये जाते तो नगर व गांव हरा भरा रहता है। लेकिन वर्तमान समय में पेड़ तो काटे जा रहे है, लेकिन लगाना कोई नहीं चाह रहा है। अचानक विभाग के द्वारा अभियान चलायी जाती है तो उसमें फार्मेल्टी के रूप में भाग ले लेते है। पहले महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत तालाब व सड़को के किनारे या नर्सरी में पेड़ पौधे लगाये जाते थे, लेकिन वर्तमान समय में यह योजना बंद पड़ गई है। पूर्व वर्षो में नेताओ के द्वारा लगाये गये पौधे अभी जिंदा है यह बताना मुश्किल है। वही, पर्यावरण को बचाने के लिए विभाग के द्वारा समय-समय पर योजना चलायी जानी चाहिए। जिससे ग्रामीणों में वृक्षारोपण को लेकर जागरूकता आयेगी और पर्यावरण पहले की तरह हरा-भरा दिखेगा।











