बलौदाबाजार,
फागूलाल रात्रे, लवन।
फागूलाल रात्रे, लवन।
ग्रामीण अंचलों में इन दिनों किसानी कार्य के साथ-साथ लोग खपरैल वाले घरों को बरसात से पहले सुधारने में लग गए है। तप्ती गर्मी के चलते ग्रामीणों को इसे सुधारने के लिए मजदूर भी नहीं मिल पा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपने-अपने घरों पर छावनियों में बांस-बल्ली बदलने के साथ टूटे खपरैल को भी बदलकर मरम्मत कर रहे है। बता दें कि क्षेत्र में मौसम बार-बार बदल रहा है।
वहीं, आगामी 15 जून के आसपास क्षेत्र में मानसून दस्तक देने के आसार मौसम वैज्ञानिकों द्वारा लगाई जा रही है। जिससे बारिश नगर एवं ग्रामीण क्षेत्र के रहवासी अपनी छावनी वाले घरों की मरम्मत व सुधार कार्य में जुटे हुए हैं। ग्रामीण मजदूर बनकर दूसरों की छावनियों पर चढ़कर छप्पर बदलने लगे हुए है। कहीं-कहीं पर झुग्गी-झोपड़ियों को प्लास्टिक व टिन से ढकने का कार्य इन दिनों चल रहा है।
दरअसल इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में कृषक खेती- किसानी की तैयारी में जुट गए हैं। ऐसे में सुधार के लिये मजदूरों का टोटा हो गया है। इसके अलावा जो मजदूर काम पर आ रहे हैं। बारिश का सीजन नजदीक होने के चलते लोग भी जल्द से जल्द अपने घरों की मरम्मत कराना चाह रहे हैं। ऐसे में ही घर के मालिक ही अपना आशियाना संवारने में जुट गये हैं।
क्षेत्र से विलुप्त हो रहे हैं खपरैल वाले घर
ग्राम कोरदा के किसान बिसेर यादव, एवं भालुकोना के किसान मनोज साहू ने बताया कि आज के बदलते दौर में खपरैल का अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है। पूर्व में नगर सहित ग्रामीण अंचलों में घरों की पहचान खपरैल की महत्ता कम हो गई है। वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्रों में तो गिने-चुने ही मकान होंगे, जहां खपरैल की छत हो।
वहीं अब लोग खपरैल की जगह पक्के मकान बना रहे है। एक समय था जब बारिश का सीजन आते ही खपरैल बनाने वालों के पास सांस लेने की फुर्सत नहीं होती थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि खपरैल की मांग लगभग नहीं के बराबर रह गई है। ऐसे में उनके सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गई है। वहीं कई खपरैल बनाने वाले जो बरसों से यही काम कर रहे हैं। कुल मिलाकर घरों की शान समझे जाने वाले खपरैल में अब अस्तित्व का खतरा मंडरा रहा है।










