बलौदाबाजार,
फागूलाल रात्रे, लवन।
फागूलाल रात्रे, लवन।
ग्राम कोरदा में कोमल प्रसाद वर्मा, भाई महावीर वर्मा एवं मोरध्वज के यहां आयोजित श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह का आयोजन 12 मार्च से प्रारंभ हुआ जो 19 मार्च तक चलेगा। उक्त कार्यक्रम का कथा स्थल सरखोर रोड में स्थित मोरध्वज वर्मा के घर पास चल रहा है। कथा समय सुबह 10 बजे से प्रारंभ होगा जो दोपहर 12 बजे तक तथा दोपहर 3 बजे से शाम तक चलेगा। कथा वाचक पंडित गौरव जोशी नगोई बिलासपुर वाले रहेंगे। कथा वाचक पंडित गौरव जोशी नगोई बिलासपुर ने पहले दिन भागवत कथा के बारे में विस्तार से समझाया। दूसरे दिन पंडित जोशी ने परीक्षित की जन्म और सुखदेव आगमन की कथा सुनाई। उन्होने कहा कि जब राजा परीक्षित माता के गर्भ में थे, उसी समय अश्त्थामा ने ब्रम्हास्त्र का प्रयोग परीक्षित की मां उत्तरा के गर्भ पर किया। उन्होंने बताया कि उत्तरा ने भगवान श्री कृष्ण को पुकारा। भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ की स्वयं रक्षा की। जब परीक्षित पैदा हुआ, उसी समय वह उठकर बैठ गया। जो भी नवजात परीक्षित को उठाकर अपनी गोद में बैठाने का प्रयास करता, वह उदास होकर बैठ जाता। लेकिन जैसे ही श्रीकृष्ण ने नवजात परीक्षित को अपनी गोद में उठाया, तो वह जोर जोर से हंसने लगा। विद्वानो ने नवजात शिशु का नाम परीक्षित रखा क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं ही इस बच्चे की मां के गर्भ में रक्षा की थी। राजा बनने पर परीक्षित ने कलयुग को दंड देने का प्रसंग सुनाते हुए पंडित जोशी ने कहा कि कलयुग राजा परीक्षित की शरणागति हो गया है, इसलिए उसे क्षमा कर दीजिए। कलयुग ने अपने रहने का स्थान को मांगा तो राजा ने चार स्थान दिए। पहला स्थान जुआ क्रीड़ा, दूसरा शराब खाना, तीसरा वैश्य स्थल दिए। तीनो स्थानो के बारे में सुनकर कलयुग ने राजा परीक्षित से कोई अच्छा स्थान प्रदान करने को कहा। इस पर राजा द्वारा भूल से उनके मुख से चौथे स्थान का नाम सोना निकल गया। कुछ समय पश्चात राजा ने अपने पूर्वजो के मुकुटो को देखना चाहा तो एक एक मुकंट बहुत सुन्दर था जिसको धर्मराज युधिष्ठिर ने छिपाकर रखा था। वह मुकूट जरासंध का था जिसको भीम छीन कर लाया था। राजा ने जैसे ही उस सोने के मुकुट को पहना, कलयुग उसकी बुद्वि पर सवार हो गया। राजा जंगल में शिकार को खेलते हुए जंगल में स्थित शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचा और अपना स्वागत करवाने को कहा। ऋषि शमीक ध्यान में थे। राजा की बुद्वि बिगड़ गई और उसने एक मरे सांप को ऋषि के गले में डाल दिया। ऋषि के पुत्र को जैसे ही इस बारे में पता चला उसने तुरंत राजा को श्राप दे दिया कि सर्पो का पूर्वज तदाक सर्प तुम्हे सातवें दिन मार डालेगा। ध्यान भंग होने के बाद वह राजा को घर जाकर मुकुट उतारने के बाद पश्चाताप की अग्नि को महसूस करते हुए रोने लगा। उन्होंने कहा कि पाप एक व्यक्ति के जीवन को सही मार्ग से गलत मार्ग की ओर मोड़ देता है। उन्होंने कहा कि आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति को अच्छे व पुण्य के कार्य करने चाहिए।
पंडित गौरव जोशी ने कहा कि महर्षि व्यास जी की तपस्या से लेकर शुकदेव जी का बारह वर्षों तक गर्भ में रहना, उनका वैराग्य, ज्ञान और संन्यास, राजा जनक की परीक्षा, और अंत में भागवत सप्ताह की वह अमर कथा जिसमें मृत्यु भी हार गई और भक्ति जीत गई। यह कहानी हमें सिखाती है कि अंत समय में यदि भगवान की स्मृति बनी रहे, तो मृत्यु भी मोक्ष का द्वार बन जाती है। इस दौरान कोमल प्रसाद वर्मा, बिरज बाई वर्मा, महावीर वर्मा, बैसाखिन वर्मा, मोर ध्वज वर्मा, गुलाब बाई वर्मा, मुख्य जजमान जोगेंद्र वर्मा, नन्द बाई वर्मा, रवि वर्मा, मृत्युंजय वर्मा, रज्जू वर्मा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण जन उपस्थित रहे।









